Skip to main content

कर्पूरी ठाकुर : एक राजनीतिक योद्धा

कर्पूरी ठाकुर : एक राजनीतिक योद्धा जिसने अपमान का घूंट पीकर भी बदलाव की इबारत लिखी

कर्पूरी ठाकुर के मुख्यमंत्री रहते हुए ही बिहार अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण लागू करने वाला देश का पहला सूबा बना था

1990 की बात है. बिहार में खगड़िया जिले में पड़ने वाले अलौली में लालू प्रसाद यादव का एक कार्यक्रम था. इस दौरान उन्होंने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का जिक्र किया. लालू यादव का कहना था, ‘जब कर्पूरी जी आरक्षण की बात करते थे, तो लोग उन्हें मां-बहन-बेटी की गाली देते थे. और, जब मैं रेजरबेसन (रिजर्वेशन) की बात करता हूं, तो लोग गाली देने के पहले अगल-बगल देख लेते हैं कि कहीं कोई पिछड़ा-दलित-आदिवासी सुन तो नहीं रहा है.’ लालू प्रसाद यादव ने आगे इसका श्रेय उस ताकत को दिया जो कर्पूरी ठाकुर ने हाशिये पर रह रहे समुदायों को दी थी.
देखा जाए तो यही वह खूबी थी जिसके चलते बिहार के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के नाम के आगे जननायक की उपाधि जुड़ी. उनका नाम उन महान समाजवादी नेताओं की पांत में आता है जिन्होंने निजी और सार्वजनिक जीवन, दोनों में आचरण के ऊंचे मानदंड स्थापित किए थे.
पैमानों की इस ऊंचाई के कई किस्से हैं. 1952 में कर्पूरी ठाकुर पहली बार विधायक बने थे. उन्हीं दिनों उनका आस्ट्रिया जाने वाले एक प्रतिनिधिमंडल में चयन हुआ था. उनके पास कोट नहीं था. तो एक दोस्त से कोट मांगा गया. वह भी फटा हुआ था. खैर, कर्पूरी ठाकुर वही कोट पहनकर चले गए. वहां यूगोस्लाविया के मुखिया मार्शल टीटो ने देखा कि कर्पूरी जी का कोट फटा हुआ है, तो उन्हें नया कोट गिफ़्ट किया गया. आज जब राजनेता अपने महंगे कपड़ों और दिन में कई बार ड्रेस बदलने को लेकर चर्चा में आते रहते हों, ऐसे किस्से अविश्वसनीय ही लग सकते हैं.
एक और उदाहरण है. 1974 में कर्पूरी ठाकुर के छोटे बेटे का मेडिकल की पढ़ाई के लिए चयन हुआ. पर वे बीमार पड़ गए. दिल्ली के राममनोहर लोहिया हास्पिटल में भर्ती थे. हार्ट की सर्जरी होनी थी. इंदिरा गांधी को जैसे ही पता चला, एक राज्यसभा सांसद को वहां भेजा और उन्हें एम्स में भर्ती कराया. ख़ुद भी दो बार मिलने गईं. इलाज के लिए अमेरिका भेजने की पेशकश की. सरकारी खर्च पर. कर्पूरी ठाकुर को पता चला तो उन्होंने कहा कि वे मर जाएंगे पर बेटे का इलाज़ सरकारी खर्च पर नहीं कराएंगे. बाद में जेपी ने कुछ व्यवस्था कर न्यूज़ीलैंड भेजकर उनके बेटे का इलाज़ कराया.
इसी तरह एक और किस्सा है कि प्रधानमंत्री चरण सिंह उनके घर गए तो दरवाज़ा इतना छोटा था कि चौधरी जी को सिर में चोट लग गई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश वाली खांटी शैली में चरण सिंह ने कहा, ‘कर्पूरी, इसको ज़रा ऊंचा करवाओ.’ जवाब आया, ‘जब तक बिहार के ग़रीबों का घर नहीं बन जाता, मेरा घर बन जाने से क्या होगा?’
कर्पूरी ठाकुर का जीवन ताउम्र संघर्ष रहा. 1978 में बिहार का मुख्यमंत्री रहते हुए जब उन्होंने हाशिये पर धकेल दिये वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में 26 प्रतिशत आरक्षण लागू किया तो उन्हें क्या-क्या न कहा गया. लोग उनकी मां-बहन-बेटी-बहू का नाम लेकर भद्दी गालियां देते. अभिजात्य वर्ग के लोग उन पर तंज कसते हुए कहते - कर कर्पूरी कर पूरा, छोड़ गद्दी, धर उस्तरा. यह तंज इसलिए कि कर्पूरी ठाकुर नाई समुदाय से ताल्लुक रखते थे.
1978 में कर्पूरी ठाकुर की सरकार ने सिंचाई विभाग में 17000 पदों के लिए आवेदन मंगाए. हफ्ता भर बीतते-बीतते उनकी सरकार गिर गई. कई इन दोनों बातों का आपस में संबंध मानते हैं. उनके मुताबिक पहले होता यह था कि बैक डोर से अस्थायी बहाली कर दी जाती थी, बाद में उसी को नियमित कर दिया जाता था. माना जाता है कि एक साथ इतने लोग खुली भर्ती के ज़रिये नौकरी पाएं, यह सरकारी व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठे एक वर्ग को मंजूर नहीं था सो कर्पूरी ठाकुर को जाना पड़ा.
लालू प्रसाद यादव के वे राजनीतिक गुरू थे. और हो सकता है कि जनता से संवाद की चतुराई का कुछ हिस्सा लालू यादव ने उनसे भी सीखा हो. इसका अंदाजा एक किस्से से भी लगाया जा सकता है. अपनी मौत से तीन महीने पहले कर्पूरी ठाकुर एक कार्यक्रम में शिरकत करने अलौली गए थे. वहां मंच से वे बोफोर्स पर बोलते हुए राजीव गांधी के स्विस बैंक के खाते का उल्लेख कर रहे थे. भाषण के दौरान ही उन्होंने धीरे से एक पर्ची पर लिखकर पूछा कि ‘कमल’ को अंग्रेज़ी में क्या कहते हैं. लोकदल के तत्कालीन ज़िला महासचिव हलधर प्रसाद ने उस स्लिप पर ‘लोटस’ लिख कर कर्पूरी जी की ओर बढ़ाया. इसके बाद उन्होंने कहा, ‘राजीव मने कमल, और कमल को अंग्रेजी में लोटस बोलते हैं. इसी नाम से स्विस बैंक में खाता है राजीव गांधी का.’ .
कर्पूरी ठाकुर जब मुख्यमंत्री थे तो उनके प्रधान सचिव थे यशवंत सिन्हा. वे आगे जाकर वाजपेयी सरकार में वित्त और विदेश मंत्री बने. किस्सा है कि एक दिन दोनों अकेले में बैठे थे तो कर्पूरी ठाकुर ने यशवंत सिन्हा कहा, ‘आर्थिक दृष्टिकोण से आगे बढ़ जाना, सरकारी नौकरी मिल जाना, इससे क्या यशवंत बाबू आप समझते हैं कि समाज में सम्मान मिल जाता है? जो वंचित वर्ग के लोग हैं, उसको इसी से सम्मान प्राप्त हो जाता है क्या? नहीं होता है.’
आगे उन्होंने अपना उदाहरण दिया. वे मैट्रिक में फर्स्ट डिविज़न से पास हुए थे. नाई का काम कर रहे उनके बाबूजी उन्हें गांव के समृद्ध वर्ग के एक व्यक्ति के पास लेकर गए और कहा, ‘सरकार, ये मेरा बेटा है, फर्स्ट डिविजन से पास किया है.’ उस आदमी ने अपनी टांगें टेबल के ऊपर रखते हुए कहा, ‘अच्छा, फर्स्ट डिविज़न से पास किए हो? मेरा पैर दबाओ.’
इस तरह की तमाम चुनौतियों से पार पाते हुए कर्पूरी ठाकुर आगे बढ़े. 1967 में जब पहली बार नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ तो महामाया प्रसाद के मंत्रिमंडल में वे शिक्षा मंत्री और उपमुख्यमंत्री बने. उन्होंने मैट्रिक में अंग्रेज़ी की अनिवार्यता समाप्त कर दी और यह बाधा दूर होते ही क़स्बाई-देहाती लड़के भी उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर हुए, नहीं तो पहले वे मैट्रिक में ही अटक जाते थे.
1970 में 163 दिनों के कार्यकाल वाली कर्पूरी ठाकुर की पहली सरकार ने कई ऐतिहासिक फ़ैसले लिए. आठवीं तक की शिक्षा मुफ़्त कर दी गई. उर्दू को दूसरी राजकीय भाषा का दर्ज़ा दिया गया. सरकार ने पांच एकड़ तक की ज़मीन पर मालगुज़ारी खत्म कर दी. जब 1977 में वे दोबारा मुख्यमंत्री बने तो एस-एसटी के अलावा ओबीसी के लिए आरक्षण लागू करने वाला बिहार देश का पहला सूबा बना. 11 नवंबर 1978 को उन्होंने महिलाओं के लिए तीन (इसमें सभी जातियों की महिलाएं शामिल थीं), ग़रीब सवर्णों के लिए तीन और पिछडों के लिए 20 फीसदी यानी कुल 26 फीसदी आरक्षण की घोषणा की. इसके लिए ऊंचे तबकों ने एक बड़े वर्ग ने भले ही कर्पूरी ठाकुर को कोसा हो, लेकिन वंचितों ने उन्हें सर माथे बिठाया. इस हद तक कि 1984 के एक अपवाद को छोड़ दें तो वे कभी चुनाव नहीं हारे.
सादगी के पर्याय कर्पूरी ठाकुर लोकराज की स्थापना के हिमायती थे. उन्होंने अपना सारा जीवन इसमें लगा दिया. 17 फरवरी 1988 को अचानक तबीयत बिगड़ने से उनका देहांत हो गया. आज उन्हें एक जातिविशेष के दायरे में सीमित कर दिया जाता है जबकि उनके दायरे में वह पूरा समाज आता था जिसकी तीमारदारी को उन्होंने अपना मिशन बना लिया था.
अपनी राय हमें  इस लिंक या mailus@satyagrah.com के जरिये भेजें.                         https://satyagrah.scroll.in/article/113087/karpuri-thakur-life-and-work-profile?fbclid=IwAR2d4V_aVYPBzYD_cmw21fpue-qf3zX6njJL67fkHh-DgGQjM7CAhvvFiRg

Comments

Popular posts from this blog

The Long Fight to Be Heard: How Julie K. Brown forced the world to see the crimes of Jeffrey Epstein? - By Dr. Rahul Kharat

The Long Fight to Be Heard: How Julie K. Brown forced the world to see the crimes of Jeffrey Epstein: Article by Dr. Rahul Kharat (या लेखाचा मराठी भाषेतील अनुवाद इंग्रजी लेखाच्या खाली दिला आहे.) When journalism works at its best it does two things: it finds those who have been silenced and gives their stories a voice, and it forces institutions to answer for what they let happen. That is the story of one reporter’s stubborn, painstaking work — reporting that peeled back decades of secrecy, challenged powerful people, and changed the course of a legal narrative that had protected a wealthy predator. The outlet that published much of that work was the  Miami Herald , but the engine behind the investigation was the single-minded determination of a reporter who refused to let the story die. Julie K. Brown spent more than a year tracking down survivors, court documents and hidden agreements. She located and spoke with scores of women who had never told their stories publicly — over 60,...

Book Review: Bunch of Thoughts By Gowalkar M.S.

      Book Title : Bunch of Thoughts Author : M. S. Golwalkar First Publication : 1966 by Sahitya Sindhu Prakashana Pages : Approximately 783 pages (varies slightly by edition) Current Edition : Multiple reprints by Sahitya Sindhu Prakashana; the most commonly circulated edition is the 2000s reprint. Structure : The book is divided into three major sections: 1.       Our Nationhood Defined 2.       Internal Threats 3.       The Path to Glory Each section contains several essays or lectures compiled thematically, many drawn from Golwalkar’s speeches to RSS swayamsevaks (volunteers). Section I – “Our Nationhood Defined” The opening section of Bunch of Thoughts , titled “Our Nationhood Defined,” lays the ideological foundation of M. S. Golwalkar’s conception of India as a nation. This part of the book is arguably the most fundamental, for it introduces and elaborates on Golwalka...

दप्तर दिरंगाई कायदा, 2006

दफ्तर दिरंगाई कायदा,  2006 माहिती अधिकार कायदा २००५ अधिक प्रभावी होण्यासाठी महाराष्ट्र राज्य सरकारने ‘अभिलेख व्यवस्थापन कायदा’ व ‘दफ्तर दिरंगाई कायदा’ असे दोन महत्त्वपूर्ण कायदे २००६ साली संमत केले. यातील दफ्तर दिरंगाई कायद्याप्रमाणे शासकीय कर्मचाऱ्यांकडून शासकीय कर्तव्ये पार पाडताना जो विलंब होतो, त्याला प्रतिबंध घालण्यासाठी अशा विलंबासाठी संबंधित कर्मचाऱ्यांवर शिस्तभंगाच्या कारवाईची तरतूद आहे.या कायद्यामुळे सर्वसामान्य नागरिकांना शासन दरबारात किमान उभे राहण्याचे तरी धैर्य आले आहे आणि शासकीय अधिकाऱ्यांच्या बेमुर्वतखोरपणाला थोडासा का होईना चाप बसला आहे. मात्र, हा कायदा वापरताना या कायद्याच्या मर्यादाही लक्षात यायला लागल्या आहेत. पहिली मर्यादा म्हणजे ‘सदरहू कागदपत्रांचा आढळ होत नाही’ अशा प्रकारची शासकीय खात्यांकडून सर्रास मिळणारी उत्तरे. यावर प्रभावी उपाय असणाऱ्या अभिलेख व्यवस्थापन कायदा २००६ बद्दल आपण याच स्तंभातून काही महिन्यांपूर्वी माहिती घेतली, ज्यात कोणती कागदपत्रे किती दिवस सांभाळून ठेवावी व हा कालावधी संपण्याच्या आत ती नष्ट झाली तर संबंधित अधिकाऱ्याला दहा हजार रुपये दंड...